बलिया की रेल सुविधाओं में सुधार के पीछे एक सच्चे कर्मयोगी की कहानी – निर्भय नारायण सिंह

बलिया: एक ऐसा जिला, जिसकी पहचान उसके सांस्कृतिक, साहित्यिक और राजनीतिक धरातल पर हमेशा खास रही है। यहां के प्रसिद्ध साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी कहते हैं—“जवना के क्लिष्टता सरलता में विलक्षण सामंजस्य बा”, यानी बलिया की प्रकृति जितनी जटिल है, उतनी ही सहज भी। आचार्य रघुनाथ शर्मा के संस्कृत वांग्मय की तरह—गूढ़ भी, सरल भी। पर राजनीतिक नजरिए से देखें तो बलिया की नियति जैसे संघर्षों से जूझते रहने की ही रही है—न प्रतिनिधि कुछ करता है, न जनता अधिकारों के लिए पूरी ताक़त से आवाज़ उठाती है। बस, सब अपनी गति से चलता रहता है।

लेकिन हाल के वर्षों में कुछ ऐसा बदला है, जिससे बलिया के लोगों के जीवन में थोड़ी राहत आई है—यात्री रेल सेवाओं और स्टेशन के नवीनीकरण में हुआ सुधार। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसके पीछे एक ऐसे शख्स का नाम जुड़ा है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है—निर्भय नारायण सिंह, जो इस वक्त उत्तर रेलवे में मुख्य यात्री परिवहन प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं।

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दिल्ली स्थित बड़ोदा हाउस से निर्भय नारायण सिंह जिस क्षेत्र की रेल व्यवस्थाएं संभालते हैं, उसमें बलिया, वाराणसी और छपरा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। दिलचस्प बात यह है कि निर्भय सिंह बलिया के बैरिया विधानसभा क्षेत्र से आते हैं। और यही उनका बलिया से जुड़ाव उनकी कार्यशैली में भी झलकता है।

राजनीतिक गलियारों में भले ही नई रेल सेवाओं का श्रेय लेने की होड़ मची हो, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि बलिया में रेल सुविधाओं के विस्तार का मुख्य श्रेय अधिकारी स्तर पर निर्भय नारायण सिंह को जाता है।

एक हालिया उदाहरण देखें—छपरा से चलने वाली पैसेंजर ट्रेन (75101), जो पहले औड़िहार तक जाती थी, अब उसे बढ़ाकर सारनाथ तक कर दिया गया है और उसका नया नंबर 05163 हो गया है। बाहर से यह बदलाव मामूली लग सकता है, लेकिन इसके पीछे सोच बहुत गहरी है।

निर्भय नारायण सिंह के मुताबिक, पहले बलिया से वाराणसी तक आने-जाने में यात्रियों को औड़िहार से अतिरिक्त 100-120 रुपये खर्च करने पड़ते थे। अब, यही खर्च घटकर 20-25 रुपये रह गया है। यदि प्रतिदिन 500 यात्री इस मार्ग से यात्रा करते हैं, तो यह बदलाव महीने भर में लगभग 15 लाख रुपये की बचत करवा देता है। सालभर में यह आंकड़ा 1 करोड़ 80 लाख रुपये तक पहुँच जाता है।

ऐसा सकारात्मक बदलाव किसी आम सोच वाले व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक दूरदृष्टि रखने वाले, संवेदनशील और ज़मीन से जुड़े अधिकारी का होता है। और बलिया के लिए आज अगर कोई सच्चा प्रयास कर रहा है, तो वह हैं—निर्भय नारायण सिंह।

बलिया का समय सच में बदल रहा है। और इस बदलाव के पीछे राजनीति नहीं, बल्कि एक कर्मठ अधिकारी की सोच और मेहनत है।

Edited By: Parakh Khabar

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